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narrative therapy india

A space to share stories of our work using narrative practices with children, adults and families in the Indian context

बच्चों और युवाओं के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा (In Conversation with Children and Young Adults about Mental Health)

On the 10th of October Ummeed celebrated World Mental Health Day with an exciting Panel Discussion comprising of children and young people at the Ummeed Training Facility, Mumbai.
There were conversations with children and young people where they shared the power of personal stories around mental health and changing the way society understands the same. Our hope was that the conversations can inform our practices and understanding around mental health.
The panel discussion was facilitated in Hindi.
Here’s an excerpt of the Panel discussion.

 

जागतिक मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर १० अक्टूबर २०१८ को उम्मीद चाइल्ड डेव्हलपमेंट सेंटर में पैनल चर्चा आयोजित किया गया था।

 

इस पैनल में हमने बच्चों और युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य के विषय में चर्चा के लिए आमंत्रित किया था। उन्होंने बड़े उत्साह के साथ अपनी व्यक्तिगत कहानियाँ और अनुभवों के द्वारा मानसिक स्वास्थ्य की प्रथाएँ कैसी होनी चाहिए, यह सूचित किया।

 

उस चर्चा का कुछ हिस्सा, आपके लिए :

To watch the video of the same, kindly click on the link given below:

इसका विडियो देखने के लिए, नीचे दी गई लिन्क को क्लिक कीजिए :
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रविराज: हम प्रश्न शुरू करेंगे। यह जो प्रश्न आए हैं, हम शायद से २ या ३ प्रश्न ले पाएँगे इनमें से। तो पहला प्रश्न जो यहाँ पे हैं, ऐसे कौन-कौन से तरीके हैं अपने मानसिक स्थिति को बताने के लिए…लोग लिखते हैं, कवितायें लिखते है हैं और चित्रकारी करते हैं। कोई और तरीके हैं जहाँ  पे लोग अपनी मानसिक स्वास्थ्य के बारे में अपने विचार और भावनाएँ व्यक्त कर सकें?

अंजलि: मैं लिखती हूँ , लेकिन अगर मेरा लिखने का मन नहीं है तो मैं गाने सुनती हूँ, और अगर कोई ऐसी स्थिति है जो मुझे बहुत प्रासंगिक लग रहा है तो जिसको मैं सुनाना चाहती हूँ – वह यही बैठे हैं, और मुझे देख रहे हैं तो मैं उनको वह गाना सुना देती हूँ, ताकि उनको अगर पूरी परिस्थिति न समझ में आ रही है तो कुछ तो समझ में आएगा। कुछ तो उनको वाइब मिल जाएगा की ऐसा नहीं तो, ऐसा हो रहा है। और मैं नाचती हूँ।  तो नाचना, अगर मुझे लिखना नहीं है तो। इस तरह से मैं अपने आप को व्यक्त करती हूँ।

संकेत: मैं अगर ऐसी परिस्थिति में हूँ जहाँ मैं बात नहीं करना चाहता तो या तो मैं रो देता हूँ; तो रोना भी अच्छी बात होती है; या फिर आप गाना सुनो। मैंने यह निरीक्षण किया है के गाने सुनना ऐसा..ऐसी चीज़ है जो बहुत से लोग में सामान्य है चाहे वह बड़े से बड़ा…हमारे माँ-बाप, या बड़ें क्यों न हो या बच्चे क्यों न हो तो वह एक चीज़ है। एक और चीज़ कह सकता हूँ की मैं यह महसूस किया है के लोगों के साथ महसूस किया है ही अगर हमारे दिल की बात बता देते है हैं, तो हमारा दिल हल्का हो जाता हैं है। तो ठीक है, अगर हमें किसी इंसान को नहीं बताना तो हमारे कोई भी…युवाओं के पास एकाध टेडी-बेयर रहता ही है। तो उनको बता दो क्योंकि अक्सर ऐसा होता है की सबसे भरोसेमंद चीज़ होता है तो वह निर्जीव वस्तुयें होंगी। क्योंकि न तो…क्योंकि हम उन्हें बताते हैं, क्योंकि न तो वह हमें सुन रहे हैं, न तो हमें समझ रहे हैं और न ही वह हमें अपनी राय बता सकेंगे।तो चाहे तो उनको बता सकते है अपनी भावनाएं। क्योंकि मैंने यह किया है। मैंने अनुभव किया है, मैंने बहुत बार किया है। मेरा एक soft-toy है और मैं, जब भी मुझे ऐसे लगता है कि … मैं किसी को नहीं बता पाऊंगा।  कुछ है, तो मैं उस soft-toy को लेके बैठा रहता हूँ।  मैंने किसी को भी नहीं… कितने बार बोला है यह किसी को तोहफ़ा दे और मेरा है कि soft-toys पसंद हैं।  कोई मुझे तोहफ़ा दे soft-toy तो मैं वह किसी को नहीं देता।  तो आप ऐसे तरीके इस्तेमाल कर सकते है। कोशिश करो की आपको जो पसंद है, वह करो और आपको खुद के लिए समय चाहिए, आप खुद के लिए समय माँग लो। आपके जो भी परिवार वाले हैं, उनको बोल दो की अकेला छोड़ें आपको। और, किसी को ऐसा भी होता है की किसी को खाना बनाना पसंद है, तो आप खाना बनाओ। जो भी पसंद है, आप वह कर सकते हो क्योंकि कभी ऐसा होता है की आप जब तक उस बात को समझ नहीं लेते, आपको उसी के बारे में चिंता सताती रहती है। तभी आपको जो पसंद हो, वह कर सकते हैं। सोना है, सो जाओ। वह, मेरे हिसाब से वह सबसे बढ़िया तरीका होगा। तो, ऐसे परिस्थितिओं में जो पसंद है, वह करना चाहिए ताकि आपके पूरे शरीर को आपका जो भी इंस्टिंक्टस (ज्ञान) है वह भी थोड़ा शांत होने की कोशिश करेंगे।

शहबान : हाँ तो जब मैं कवितायेँ या फिर लिखता नहीं हूँ, तो मुझे लगता है कि, जब हम लोग अभिव्यक्ति की बात कर रहे हैं के ऐसे कौनसे व्यक्त करने के तरीके हैं जो कर सकते हैं या देखते हैं, या कविता करते हैं, तो मुझे लगता है की ख़ामोशी भी एक तरह की अभिव्यक्ति होती है। तो अगर आपको ऐसे लगता है कि, मतलब अपने बारे मैं बताता हूँ, तो मैं अपनी बात बताऊंगा।  तो, मुझे भी, ज़्यादातर मैं कवितायेँ करता हूँ क्योंकि मेरा हॉबी जैसा है, लेकिन ज़्यादातर समय जब ऐसे कुछ परिस्थितियां होते है, मैं चुप रहना पसंद करता हूँ। और मुझे लगता है की जब मैं चुप रहता हूँ, समय मिलता है अपने आप को समझने का।  तो मेरा चुप होना ही मुझे समय देता है चुप होने के लिए। तो मुझे लगता है की चुप भी हो सकते हो थोड़े से समय के लिए और ज़रूरी है चुप होना। अपने आप को ठहराव देना ज़िन्दगी में, कि वह समझ पाना की क्या चालू है, मुझे लगता है की वह करना चाहिए।

प्रीती: मुझे लगता है की मेरे case में कोई विकल्प नहीं हो तो, आप खुद से बात कर सकते हो। मेरे लिए, बेहतर काम करता है। बहुत बार ऐसा होता है की तुम किसी से share करते-करते तुम ही अपने समस्या का सुझाव निकाल लो। और बहुत बार ऐसे होता है के आप राहत महसूस करते हो खुद से बात करने के बाद क्योंकि बहुत बार ऐसे होता है की तुम रोज़ की भागदौड़ में हो और तुम्हारे पास खुद के लिए समय नहीं होता। तो खुद के साथ बात करना व्यक्त करता है तुम्हारे भावनाओँ को।

संकेत: तो मैं खुद के साथ बात करने के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ।  तो मैं आमतौर पर जो भी होता है, अगर समस्या आई है या कुछ भी हो, मैं अपने आप से बात करता हूँ। मेरे बहुत सारे दोस्त है और अच्छे वाले दोस्त हैं उनसे अपने आप को व्यक्त कर पाऊँ।  तो मैं जब भी ऐसी समस्या होगी  तो पहला इंसान जो भी दिमाग में आएगा, उसको मैं पहले यह कोशिश करूंगा मैं की वह समस्या को समझ पा रहा हूँ की नहीं समझ पा रहा हूँ।  तो वह खुद के साथ बात करना क्योंकी… आप बात क्यों करते हो? ताकि आपके जो दिल में आये, वह समस्या…आमतौर पर ऐसा होता है की आपको जो भी समस्या या आपको जो भी दुःख है आप किसी से जाके बयाँ करते हो तो आपको लगता है की, हाँ, कोई मेरे साथ है। लेकिन उस समस्या का सुझाव ढूंढना, वह आप ही के हाथ में होता है।  हाँ, कोई सलाह दे सकते हैं और वह भी काम कर जाता है लेकिन हमें कोशिश करना चाहिए की पहले हम खुद उसके सुझाव ढूंढने की कोशिश करें क्योंकि अगर हम वह करेंगे तो हम उस समस्या से कुछ सीख भी सकते है, अपने आप को आगे बढ़ाना कर सकते हैं। तो आप वह चीज़, जो खुद के साथ बातचीत करना है, मैं तो कहूंगा की हर दिन अपने आप को कोई समय दो, कम से कम १० मिनट, के आप सोच सको अपने बारे में।  कुछ भी हो, आप कुछ भी सोच सकते हो।  ऐसा नहीं है कि अपने समस्याओं के बारे में सोचो।  कई बार मैं ऐसा बैठा रहता हूँ, तो मैं बैठके फिर सोचता हूँ की पोकेमॉन होते तो क्या होता? मतलब असली में, क्या होता? अगर मैं पावर रेंजर होता, और आकाशगंगा से कोई आता, तो मैं कैसे बचता? मेरे टीम में कौन-कौन होगा? तो ऐसा कुछ भी सोच सकते हो जिससे आपको हँसी आये, जो आपको अच्छा लगे। और अगर कभी ऐसे आपको लगा की आप बहुत ही दुःख महसूस कर रहे हो और आपको कुछ प्रेरणा की ज़रुरत है तो आप प्रेरणादायक वीडियोस देखो।  बीच में जब में १० वीं में था और मुझे ऐसे बहुत समस्याएं आई थी तो मैं संदीप माहेश्वरी के वीडियोस देखता था, जो मुझे बहुत प्रेरणा देती थी। और ऐसे कुछ प्रेरणादायक वीडियोस हैं जो आप देख सकते हो।  तो आप ऐसी चीज़ कर सकते हो जिससे आपको मदद मिलेगी लेकिन अपने लिए समय निकालना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि तभी, उसी समय में आप अपने बारे में सोच पाते हो।

रविराज: मेघा, आपको कुछ बोलना है?

(मेघा नहीं बोलती है)

रविराज: अगला प्रश्न यह है कि धर्म और मानसिक स्वस्थ्य का क्या संबंध है? धर्म और मानसिक स्वास्थ्य में क्या ताल्लुक है?

अंजलि: मेरे ख्याल से जो धर्म…यह मेरी राय है कि धर्म और मानसिक स्वास्थ्य के बीच में जो ताल्लुक है, वह विश्वास है। तो, हर किसी का धर्म एक जीने का ज़रिया है, जिस तरह से वह जीते है हैं। धर्म एक जीने का तरीका है, यह तो बताता है आपको किस तरह से करना है, क्या करना है, क्या नहीं करना है, और हमारी मान्यता भी है। बहुत बार ऐसा होता है कि मैं अगर एक धर्म से आती हूँ, मेरे धर्म में इस चीज़ को मानते हैं, तो मैं भी उसे अपनाती हूँ। तो..मेरे माँ-बाप का उदाहरण लेती हूँ…मेरे माँ-बाप को लगता है की जो लोग रोज़ सुबह उठकर पूजा नहीं करते तो, कम से कम नहाने के बाद, भगवान से बात कर लेते है, तो उनका दिन अच्छा जाता है और यह मेरे माँ-बाप मानते है। और जिस दिन, जिस दिन वह भूल गए ना , तो वह चिंता में रहते है की आज का दिन अच्छा नहीं होगा।  मेरे पिताजी को ऐसा लगता है की दुकान में आज का काम नहीं होगा। मेरी मम्मी को लगता है की जो भी बनाउंगी, खाना पकाऊंगी, वह भी बहुत गंदा बनेगा, भले वह अच्छा बने, पर वह चिंता में रहती हैं कि कभी अगर नमक ज़्यादा पड़े, फिर वह ऐसा कर लेते हैं कि,  हाँ क्योंकि मैंने आज प्रार्थना नहीं किया, इसलिए ऐसा हो गया। मेरे ख़्याल से वह भी होता है।  हर चीज़ के अच्छे और बुरे हिस्से होते है। हाँ, एक यह है और दूसरा है अध्यात्मवाद जो भी मेरे ख़याल से मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बहुत ज़रूरी है। मुझे यह संबंध दिखता है।

संकेत: मैं बोलना चाहता हूँ की हम, आजकल तो इतने हम, मतलब बहुत लोग विश्वास करते हैं।  बहुत से ऐसे भी लोग हैं, सिर्फ, मतलब अगर मैं मानता हूँ की मैं जो भी काम करूंगा उसमें मैं ‘law of कर्मा’ पे बहुत विश्वास करता हूँ। लेकिन मैं भगवान को इसलिए मानता हूँ क्योंकि जब भी मैं जाता हूँ, मंदिर जाता हूँ, या कुछ, मुझे एक मन की शांति मिलती है, तो मैं सुबह उठके भी मैं एक बार सिर्फ याद कर लेता हूँ। तो अगर हम कोई भी समस्या या कुछ भी हो तो क्या हमने कभी सोचा है कि हम भगवान के पास क्यों जाते हैं? क्योंकि हमको शांति मिलती है। मुझे लगता है की हमारे दिमाग को थोड़ी शांति मिलेगी तो हम तभी उस चीज़ के बारे में और अच्छे से सोच सकते हैं। और उस समस्या को ख़तम करने के लिए, और अच्छे से उस समस्या का समाधान कर सकते हैं। तो इसके लिए, मतलब, हम जब देखते हैं,मतलब, जो भी धर्म है, उसके बारे में पढ़ाई या चर्चा करते है तो वह जब हम गहरायी में जाके चर्चा/पढ़ाई करते हैं तो देखते हैं कि हमें हमारा जीने का तरीका क्या होना चाहिए।  तो वही है की हम, मेरे हिसाब से, मंदिर जाना या भगवान  में विश्वास रखना, जो भी विश्वास होते हैं जो हम मानते हैं क्योंकि वह कहीं न कहीं हमारे अच्छे के लिए होते हैं और यह मैंने खुद भी सीखा है। और दूसरी चीज़ है कि हमें शांति मिलती है वह चीज़ करके। बहुत से ऐसे लोग हैं जो विश्वास नहीं रखते भगवान में तो उन्हें जिस चीज़ से शांति मिलती है, वह करते हैं।

प्रीती: मेरे हिसाब से धर्म मतलब एक आशा की तरह होती है। जैसे की जब आजू-बाजू में जब कोई सहायता नहीं होता है, लोग धर्म को आशा की नज़रों से देखते हैं कि शायद कुछ अच्छा होगा तो वह एक तरीका बन जाता है आशा को ज़िंदा रखने के लिए। इंसान जब पूरा टूट गया हो तो वह आशा बन जाती है, एक उम्मीद बन जाती है ताकि इंसान उसका सामना कर सके।

शहबान: मुझे लगता है कि जब धर्म की बात करते हैं हम लोग, तो, यह एक जीने का तरीका है। धर्म और मानसिक स्वास्थ्य साथ में चलते हैं, मसलन एक साथ, एक दुसरे के साथ जाते है।  तो यह बहुत अच्छी बात भी हो सकती है या बहुत बुरी बात भी। तो, मेरे लिए, वह बुरी जैसी है, तो वह आपको बर्बाद कर सकता है। तो बहुत सारी चीज़ें है जो कर सकता है।

मेघा: हर एक धर्म में ना, हर एक धर्म में, अलग-अलग, जैसे कोई ऐसा (नमश्कार) करता है जिससे उसकी मतलब धार्मिक इसमें बोला जाए तो ऐसे बोलते हैं बहुत…मतलब धर्म-धर्म ज़्यादा नहीं होना चाहिए। पर उसमें भी एक शक्ति मिलती है।  जो हम बोलते हैं कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य है, वह तंदुरस्त रखने के लिए हमें खुश रहना चाहिए, हमें शांत रहना चाहिए। तो किसी चीज़ के अलग-अलग तरीके होते हैं भगवान के पास जो प्रार्थना करते हों, जिसकी वजह से शांति मिलती है, वह ज़रूरी होता है के अपने मन से करें। तो एक सिर्फ़ वह हमारे लिए एक ज़रिया बन गया है हमारी मानसिकता को सुदृढ़ बनाने के लिए।

संकेत: और मैं एक और बात बोलना चाहूँगा की जैसे हम यह जानते हैं कि जैसे अलग-अलग धर्म हैं तो उन में से जो भी अच्छे गुण हैं, जो भी अच्छी बातें हैं, हमें उन बातों को लेना चाहिए, मान करना चाहिए और उन पे काम करना चाहिए।  जैसे के जो भारत का संविधान है, वह कैसे बनाया गया है? वह अलग-अलग संस्कृतियों और अलग-अलग देशों से अच्छी बातों को लेके बनाया गया है। तो उसके लिए आज माना जाता है की हमारा संविधान सबसे लम्बा है और एक बहुत अच्छा संविधान माना जाता है।  उसी तरह से, जहाँ हमें अच्छी बातें मिल सके, जहाँ से हम अच्छी चीज़ें सीख सकें, तो वह लेनी चाहिए और उस पर काम करना चाहिए।

रविराज: एक और प्रश्न…जाति का मानसिक स्वास्थ्य पे क्या प्रभाव पड़ता है? जाति जिसमें लोग हिस्सा बनते है, उसके उनके मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर रहता है या थेरपी पे क्या असर पढ़ता है?

प्रीती: अगर… मुझे लगता है बहुत इम्पैक्ट होता है, बहुत असर होता है क्योंकि जो भी जाति होता है वह पहले, मैं ऐसे नहीं बोलूँगी कि वह अभी चला गया है पर पहले उसका ज़्यादा महत्त्व था। पर अभी भी है, बहुत सारे क्षेत्रों में। तो marginalize करके रखा है। तो एक तरह की सोच बना के रखी है एक तरह के जाती जाति के लिए। अगर तुम चमार हो तो ऐसा होगा, अगर तुम राजपूत हो तो ऐसा होगा, अगर तुम मुसलमान हो तो ऐसा होगा। तो यह ऐसा सोच बनाके रखा है। और बहुत बार क्या होता है, कि लोग खुद उस सोच को अपनी आइडेंटिटी एक्सेप्ट (पहचान अपनाना) कर लेते हैं। अगर में एक उदाहरण दूँ, अगर में एक चमार हूँ तो मुझे मंदिर में जाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी। या फिर मुझे ऊँचे जाति के लोगों के साथ नहीं रहना चाहिए। या फिर मैं अगर ऊँची जाति की हूँ तो मुझे किसी नीची जाति के इंसान के साथ नहीं बैठना चाहिए या फिर उससे बात नहीं करना है। और फिर यह सब का उस पे बहुत असर होता है जैसे मैंने पहले बताया था के कोई एक्सेप्टेन्स (अपनाना) नहीं है और वह marginalize करके रखा है। और हम खुद भी एक्सेप्ट (अपना लेते) कर लेते हैं, वह चीज़ को के मैं अगर ऐसी हूँ तो मुझे ऐसे ही चलना चाहिए क्योंकि सब लोग ऐसे ही चल रहे हैं। और अगर मैं कुछ अलग करने की सोचूँ, तो बाकी लोग मुझे जीने नहीं देंगे। तो क्योंकि मैं एक सोसाइटी में रहती हूँ, मुझे बहुत ज़्यादा ज़रूरत है उस सोसाइटी की, भले ही मुझे पता है की सही क्या है और गलत क्या है। मेरे घर में फिलहाल जाति को लेके बहुत से समस्या चल रहे हैं दो साल से जिसकी वजह से मेरी काउंसेलिंग भी शुरु होने वाली है। तो उस चीज़ को लेके बहुत बहस चलती है क्योंकि मेरे माँ-बाप बहुत स्ट्रॉन्ग्ली जाति में भरोसा रखते हैं और दूसरी चीज़ यह है कि जाति को लेकर कुछ होता है या मुझे नहीं रहना चाहिए किसी के साथ जो दुसरे जाती का हो। तो यह बहुत असर करता है क्योंकि उनको ऐसा लगता है की मेरी बेटी को क्या हो गया है? वह मान क्यों नहीं रही है? हम मानते है हैं। हमने उससे बचपन से यही सिखाया है कि तुम सबके साथ मिल-जुल के रहो पर जाति को सीरियसली (गंभीरता से) लेना है। यह नहीं, वह नहीं, और अब जब मैं नहीं ले रही हूँ तो मेरे में भी ऐसा है कि यह लोग समाज क्यों नहीं ले रहे है? पहले तो खुद ही मुझे बोलते है कि सबके साथ रहो फिर तुम लोग खुद ही बोलते हो के मत रहो। तो मेरे लिए भी वह एक, मेरी मानसिक स्वास्थ्य पे भी उसका असर हो रहा है जितना उनके लिए, उनके मानसिक स्वास्थ्य का असर हो रहा है। यह छोटे दर्जे की बात है। जब यह बड़े दर्जे पर चले जाता है, देश के दर्जे पर या उससे भी ज़्यादा दर्जे पर तो दंगे और यह सब होता है। तो मुझे लगता है वह बहुत ज़्यादा ज़रूरी है समझना इस चीज़ को।

शाहबान: मेरे लिए जाति बहुत ज़्यादा मायने इसलिए लगता है क्योंकि इसका असर मैं खुद नहीं तय कर सकता कि इसका असर मानसिक रूप से कितना लग सकता है क्योंकि तो जो आलरेडी जाति  रिवाज़ में थे वह लोग वहाँ पे समस्या का सामना किए। फिर सुझाव मिला की धर्म बदल देते है। जब वह धर्म बदल के दूसरे धर्म में गए तो वहां पे भी वही समस्या हुई। तो अभी भी बहुत सारे मतलब जिस गाँव से मैं आता हूँ, वहां पे बहुत सारे लोग मुसलमान हैं लेकिन अभी भी उन्हें चमार बोला जाता है। हालांकि मेरा धर्म ऐसा कहता है की हम लोग इस बारे में जाति-पात में इतना फोकस नहीं करते लेकिन अभी भी वह एक लोगों का झुंड हैं, जिनको चमार माना जाते हैं। तो उन्हें अलग रखा जाता है। तो कहीं से वह लोग निकल के आए, वह उस चीज़ का समस्या या मानसिक स्वास्थय, फिर वह दूसरी जगह पे आ गए, उस चीज़ का सोचना। अब वह दूसरी जगह पे जी रहे हैं, उस चीज़ का सोचना और उनके बच्चे होंगे उस चीज़ का सोचना। तो यह बहुत बड़ा प्रभाव है और धीरे-धीरे ऐसे और मेरे लिए भी आसान नहीं है के इस तरह का सोचना के उस समय पे कितना था, कल कितना, और आगे के समय में कितना होगा। तो मेरे हिसाब से यह बहुत बड़ी समस्या है। बहुत बड़ा मसला है और बहुत बड़े लेवल पे है। हम लोग मुंबई में रहते है तो हमें दिखाए नहीं देता आमतौर पर क्योंकि हमें लगता है की यार जाति क्या है ? लेकिन जब हम छोटे जगहों पे जाएँगे for eg. मेरा गाँव है, मतलब, मैं उत्तर प्रदेश से हूँ। उत्तर प्रदेश में हमारा गाँव है जो बहुत ही गाँव जैसा है, मतलब, अभी तक वहाँ पर डेवलपमेंट (विकास) पहुंचा ही नहीं। तो वहाँ पे तुम देख सकते हो क्या फ़र्क है। तो हमारे लिए यह बहुत ज़रूरी है यह सोचना की बहुत सारे लेवल पे बहुत ज़्यादा प्रभाव हो रहा है।

प्रीती : सर, मैं कुछ बोल सकती हूँ? जब हम जाति की बात करते हैं, मानसिक स्वास्थ्य और यह सब के बारे में बात करते हैं, जब जाति की बात आती है, तो लोग सिर्फ जो नीची जाति के हैं, उनके बारे में सिर्फ बात होती है। जिसके बारे में फिर मेरे लिए बहुत बड़ा चिंता का विषय हो जाता है। कि सिर्फ उनके बारे में बात होती है, जो ऊंची जाति के हैं, उनके मानसिक स्वास्थ्य पे क्या असर होता है? वह भी तो एक, सब पे असर हो रहा है। वह भी देखने वाली बात है। मैं जहाँ से आती हूँ, मेरा गाँव जहाँ पे है, वहाँ पे अगर कभी किसी ने मुझसे यह सवाल पूछ लिया कि, तुम्हारा जाति क्या है, मुझे बताने में बहुत डर लगेगा। मैं एक राजपूत हूँ तो मैं यह बताने जाऊँ, तो लोग मुझे जनरलाइज़ (generalize) कर देते हैं। “तुम तो ऐसे होते हो। तुम तो मारने में भरोसा रखते हो। तुम लोग बहुत egoistic होते हो।” तो मुझे बहुत डर लगता है।  बीच में यह पदमावती का सब चल रहा था, तो मुझे मेरे बहुत सारे दोस्तों ने जो जाति के बारे में बात करते है, उन्होंने आके मुझे बोला के तुम्हारे में ऐसे लोग होते हैं, ऐसा सोच होता है, यह होता है, वह होता है, जिस चीज़ को लेकर मैंने लोगों से बात करना बंध कर दिया था। यह जो जाती है, वह बहुत बड़ा मसला है, ज़्यादातर इंडिया में। हम बोलते तो हैं हम diverse देश हैं, सिर्फ बोलने के लिए हैं, इधर कुछ नहीं है ऐसा। इधर आज भी तू हिन्दू है, मैं मुसलमान हूँ, तू भंगी है, मैं चमार हूँ।

संकेत: वह diversity में एकता जब बोलते हैं, वह बड़े लेवल पे तो दिखाई देती है लेकिन बेस लेवल पे वह दिखाई नहीं देती। तो अगर वह बेस लेवल पे दिखाई नहीं देती, तो आगे जाकर एक समय ऐसा आएगा हमारा बेस ही इतना मज़बूत नहीं है, तो ऊपर का पार्ट आपका भले ही मज़बूत दिखता हो, वह उतना मज़बूत है नहीं। तो कभी ना कभी तो…अभी जैसे हम इंडिया और पकिस्तान का यह देख रहे हैं, तो कभी यह भी हो सकता है कि इंडिया में जो…वैसे मैं एकदम वह नहीं कह रहा हूँ मुसलमान लोगों को… मैं आमतौर पे बोल रहा हूँ, कि कुछ भी हो सकता है। तो हमें यह पहले तय करना पड़ेगा हम पहले क्या हैं? क्या अलग-अलग जाति हैं? और अगर हैं, तो हम पहले क्या हैं? हम पहले इंसान हैं। हम सब एक जैसे हैं। हमें हमेशा कहानियाँ सुनाई जाती है जाति-रिवाज़ पर, धर्म के ऊपर, कि आप खून दे दो। खून तो वही है, लाल रंग का। लेकिन वह बात सब समझ नहीं पा रहे हैं। अभी भी वह चीज़ हैं। तो अभी इसने (शाहबान) ने जो बोला कि मुंबई में दिखाई नहीं देता, लेकिन मैं भी जब पढ़ता हूँ जैसे कि अखबार में या सोशियोलॉजी में, (१२वी तक पढ़ा है) तो उसमें भी हमारी टीचर्स ने यह बोला है, कि गाँव में या जो ग्रामीण जगह है, उधर अभी भी यह प्रथाएँ प्रैक्टिस किया जाता है की जाती है। तो पहली बात तो यह है कि हमें पहले तो उन लोगों तक पहुँचना पड़ेगा, उनसे संपर्क बनाना पड़ेगा, उनकी मदद करनी पड़ेगी, क्योंकि बहुत से ऐसे गाँव हैं, जहाँ पे बिजली नहीं है, जहाँ अभी भी कोई सुविधाएँ नहीं हैं। वह अभी भी कच्चे घरों में रहते हैं। तो अगर हम उनकी मदद करेंगे और फिर धीरे-धीरे उन्हें बता सकते है कि यह गलत है। अगर ठीक है, आपको चाहिए भी तो यह जाति प्रथा क्यों बनाया गया था? जाति प्रथा इसलिए बनाया गया था ताकि समाज एक अच्छी तरीके से चल सके। हम जब देखते है हैं ब्राह्मण तो उनको इसलिए ब्राह्मण बोला जाता है ताकि वह भगवान की सेवा कर सके और उस जो भी क्षेत्र है मंदिर का, उसका ख्याल रख सकें। क्योंकि अभी सब को समय नहीं रहता है सब चीज़ें करने का। फिर क्षत्रिय। हमारे सुरक्षा के लिए लिए कोई तो होना चाहिए, इसलिए वह बनाया गया था ताकि वह लोगों कि सुरक्षा दे सकें। फिर उसके बाद जो भी आते हैं, व्यापारियों और वह सब, वह भी ज़रूरी थे, अर्थव्यवस्था और वह सब के लिए। और जो किसान थे, अभी किसी को तो साफ़ सफाई करनी पड़ेगी, किसी को तो काम करना पड़ेगा बाकी का जो भी बचा हुआ वह। लेकिन धीरे-धीरे इसमें ऐसा हो गया है के यह शूद्र है तो यह सिर्फ साफ़ सफाई करेगा। साफ़ सफाई करना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन यह ऐसे बहुत  ने इसको, यह पहले नहीं था, पहले लोगों का बहुत आदर किया जाता था लेकिन अंग्रेज़-राज्य और उसके बाद का यह सब चालू हुआ की ऐसा generalize कर देते हैं। तो यह अभी भी चालू है। तो लोगों को यह समझना पड़ेगा और जब हम ग्रामीण जगहों पर जाते हैं तो लोगों को यह समझाना बहुत ज़रूरी है क्योंकि हमारा जो भी, यहाँ हम शहरों में रहते हैं वहां का एजुकेशन इतना मज़बूत है कि बच्चे खुद-ब-खुद समझ जाते हैं यह चीज़। लेकिन वहां के लोग यह नहीं समज पाते। वहाँ अभी भी भेद-भाव होता रहता है।

रविराज: हमारे पास समय है पर हमारे पास बहुत प्रश्न हैं तो क्या करेंगे कि में आप सब को वह प्रश्नों का कॉपी दूँगा और अगर आप सब उत्तर देंगे तो हम इकट्ठा करके ई-मेल कर देंगे सबको। उसमें बहुत सारे लोगों ने विचार भी डाले हैं आपके लिए तो आप उनका भी उत्तर दे दें।

रविराज: आप के लिए चर्चा कैसी हुई? आप यहाँ से वापस क्या लेकर जा रहे हैं? कोई एक शब्द जो आप यहाँ से वापस लेकर जा रहे हैं, वह क्या होगा?

मेघा: जब आए  थे तो बहुत डरे हुए थे लेकिन, फिर जब यहाँ पर आई, सब एक-एक एक आने लगे तो और भी दर डर गई। अरे! यहाँ तो कैसे-कैसे लोग आ रहे हैं, अभी क्या बात करेंगे? यह तो आलरेडी इतने पढ़े-लिखे हैं, इनको तो सब कुछ आता है।  इनके सामने क्या बात करेंगे? लेकिन जैसे-जैसे प्रश्न आते गए, दिल खुल गया। सारी बातें मतलब, आज अपनी सोच, सब कुछ बोल दी। अच्छा लगा। मेरा भी मानसिक स्वास्थ्य आज अच्छा हुआ।

प्रीती: मैं यहाँ से कहानियाँ ले जा रही हूँ। कहानियाँ जिनको अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। जब में यहाँ आई थी, में एक दृष्टिकोण के साथ आई थी कि मेरे हिसाब से मानसिक स्वास्थ्य यह होता है, मेरे हिसाब से मैं यह कर सकती हूँ या मैं वह कर सकती हूँ। लेकिन यहाँ पर बैठने के बाद, मुझे लगता है मैं दूसरे-दूसरे अनुभवों और दृष्टिकोण से वही चीज़ ले जा रही हूँ जिससे शायद मेरा भी दृष्टिकोण थोड़ा बदले या फिर और सोचने के लिए चीज़ मिली। तो हाँ, मैं यहाँ से कहानियाँ ले जा रही हूँ।

संकेत: पहले तो, धन्यवाद बुलाने के लिए, इतने अच्छे चर्चा के लिए पर समय कम है। मैंने बहुत बार ऐसे अनुभव किया है के ऐसे विषय के लिए समय हमेशा कम पड़ जाता है। दूसरी चीज़, मैं यहाँ से बहुत सारे दोस्त लेके जा रहा हूँ। और कोई २-३ लोगों ने बोला मुझे संपर्क करने के लिए कि नंबर दो प्लीज। और तीसरी बात के मुझे इन लोगों से भी बहुत कुछ जानने को मिला की इनकी ज़िंदगी कैसी है जो की मुझे बहुत काम आएगा लोगों को समझने के लिए। लोग कहाँ-कहाँ से आ सकते है। मुझे जैसे कॉउंसलिंग साइकोलॉजी में करियर pursue करना है तो मैं अभी यही देखता हूँ की मैं लोगों के साथ बात कैसे करूँ, उनको और कैसे जान सकूँ। तो मुझे यह सब बहुत अच्छा लगता है। तो मैं इनसे बहुत कुछ लेके जा रहा हूँ वह बता नहीं सकता, सोच के बता सकता हूँ। लेकिन बहुत कुछ लेके जा रहा हूँ, बहुत कुछ सीखने को मिला।

रविराज: शाहबान और प्रीती, कोई कविता है जिससे आप इसको ख़तम करना चाहेंगे?

शाहबान: सब की बातें सुनने के बाद मैं बहुत खुश हूँ और मैं अलास्का वाली स्माइल (हँसी) के साथ आया था और मैं उसके साथ ही जाना चाहता हूँ। और मैं वह महसूस कर रहा हूँ, वह जादू। तो यह मैं लेके जाना चाहता हूँ।

अंजली: मुझे लगता है , मैं बहुत मतलब थोड़ा और प्रोत्साहित महसूस कर रही हूँ और मैं अपने आप को खुश-नसीब समझती हूँ के मैं यहाँ पर हूँ।

संकेत: और मैं सबकी मुस्कानें लेके जा रहा हूँ। फिर मैंने देखा सबके चेहरे पर एक अलग सी मुस्कान है जो मैं हमेशा सबके चेहरे पर देखना चाहता हूँ। तो मैं जब भी ऐसा कुछ अटेंड करता हूँ (उपस्थित होता हूँ), मुस्कानें देखता हूँ सबके चेहरे की तो यह मुस्कानें बहुत पसंद है मुझे।

रविराज: धन्यवाद !

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Raviraj: We shall begin now. These are a few questions we have received from the audience of which we will be covering only 2-3 questions. I shall read the questions in English as well as Hindi. The first question is, ‘What are ways to express a mental situation besides writing, writing poems and drawing if someone doesn’t want to talk to anyone?’ (reads the same question in Hindi)

Raviraj: Yes Preeti, you may begin.

Anjali: I usually prefer to write but if I am not in the mood to do so, sometimes, I listen to songs. At times, during certain situations, I make a specific person listen to the song so he/she understands the situation and my perspective. Sometimes, when I am not in the mood to write, I dance. So these are two ways in which I express myself other than writing.

Sanket: In situations where I do not wish to talk to anyone, I cry. I believe that crying is also a good way to express a sad feeling. People may prefer to listen to songs. I have observed that people belonging to different age groups use this way to express their feelings. I’ve also experienced that we feel less burdened when we share our feelings with others. It is not necessary to share your feelings with people only. I know teenagers and youngsters who prefer to talk to a teddy-bear. Talking to non-living things can actually be a reliable way because non-living things cannot listen to us, cannot understand us and will not judge us. I usually practice this with my teddy-bear. I love soft toys and find it difficult to give them away. So, you too can use some of these tricks. It is very important to spare some time for yourself. You may ask your family to leave you alone for sometime. Some people like to cook so they may choose to do that.  It is important to do what you like especially until you address the thought that is disturbing you. The best way, in my opinion, is to sleep. All these methods would help you to calm yourself.

Shahbaan: Writing poetry is my hobby. But when I am not not in the mood to do so, I prefer to remain silent. I believe that silence is also a way of expression. It helps me understand myself better and calm down. So, you can try using this technique as well as it helps you understand what is actually going on in your life.

Preeti: In my case, I prefer self-talk. You may reach the solution of the problem you are facing by self-talk. I have experienced that, several times, you feel relieved when you talk to yourself especially when you are in between busy schedules and you have no time for yourself. Self-talk becomes a way to release your feelings. 

Sanket: I would like to share something about self-talk.  I prefer talking to others about my problems. I have many friends to whom I can express myself. So, whenever I face a problem, I talk to that person whose name first occurs to my mind. Before doing so, I use self-talk to understand the problem. Talking to others about your problems makes you realize that you are not alone but it is important to understand that you yourself have to find the solution to your problems. If you are unable to solve the problem by yourself, you may use a suggestion given by someone. Finding solutions by yourself will help you to develop and learn something from the problem. In my opinion, everyone should devote ten minutes daily to self-talk to think and self-introspect. You can think about anything of your choice. Sometimes I think about what would happen if Pokemons actually existed? Or had I been a Power Ranger, how would I have saved the world from someone from another galaxy? Who would’ve been my team members? You can watch inspirational videos to motivate yourself. During the 10th grade, I watched several videos by Sandeep Maheshwari to motivate myself.  You can watch videos by other motivational and inspirational speakers as well. You can practice these methods but it is very important to spare some time to think about yourself.

Raviraj: Megha, would you like to add anything?

(Megha nods to say no)

Raviraj : The next question is ,“How do you connect religion and mental health?

Anjali : In my opinion, the connection between religion and mental health is belief. Religion is a way of living. It tells us things we can do, ways to do those things and helps develop a belief system. People adopt some concepts because of their religious beliefs. Speaking of my parents, they believe that those who pray to God in the morning after a bath have a nice day. And the day they forget to do it, they feel stressed that they won’t have a great day. My father feels that he won’t be able to work properly in the shop. My mother feels that the food she cooks won’t taste good on such a day- it may contain more salt than required. Everything has two sides – positive and negative. I also sense a strong connection between mental health and spiritualism.

Sanket: I believe in the law of Karma as well as in God. I experience peace of mind and calmness when I visit a temple. Have we ever wondered why we visit a temple or pray to God when we are facing a problem? Because we can calm down by doing so and think about the solution to the problem. Religion also shows us the way of life. In my opinion, we tend to visit temples, pray to God, follow some beliefs because we know that benefit us. I have realized this from my experiences. There are people who do not believe in God. They may choose to do something else that helps them to calm down.

Preeti: I think religion kindles hope in a person that the situation will get better especially when others are not supporting him or her. Religion is a hope that keeps one alive and helps him or her deal with problems.

Shahbaan: I think religion is a way of life. Religion and mental health work simultaneously. So the effects can be positive or negative. If it is negative, it can destroy you.

Megha: Every religion has distinct ways to do the same thing (e.g. a namaskar to greet the person). One should not be a fanatic but religion gives us positive energy. It helps to be healthy, happy and calm. It is important to pray to God with all your heart. Religion has become a way to enhance mental health.

Sanket: I would like to add something. We must accept and imbibe the good qualities of different religions in ourselves. For example, how was the constitution of India made? It was made by adopting some contents from the constitutions of different countries. This has made it the longest constitution and a very good one. In this way, we too can learn good qualities from other religions and work on it.

Raviraj: How does the caste that one belongs to influence the mental health of that person?

Anjali : It has a tremendous impact on mental health although its importance has reduced since olden times. Marginalization of certain castes has led to certain beliefs about people belonging to those castes. If you are a Chamar, you would some some specific qualities whereas if you are a Rajput then you would have some other qualities while if you are a Muslim, you would have some qualities. This becomes a part of the mindset of people and people belonging to those castes accept the beliefs as a part of their identity. For example, if I belong to the Chamar caste, I would believe that I should not go to temple or interact with others from the upper castes. If I belong to an upper caste, then I should not interact with people from the lower castes. As I mentioned earlier, these beliefs are not only accepted by people belonging to certain castes but they also affect them. People feel that the society won’t accept them if they change something about themselves. So, despite knowing what is right and what is wrong, we make certain choices because we live in a society. I am about to begin counselling for myself due to issues related to caste at home. My parents strongly believe the concept of castes whereas I do not believe in it. This has affects me as they feel that something is wrong with me. They find it odd that I don’t believe it but they do. They have always taught me to live in harmony with everyone but never forget your caste.  On the other hand, I find it odd that my parents are unable to understand me. It has affected my mental health because they initially taught me to live with everyone and now they are telling me to do the opposite. This is an example at a smaller level (family). At higher levels (countries) such beliefs can lead to riots. So it is important to understand the way in which the caste that a person belongs to affects the mental health of the person.

Shahbaan: Personally, I feel that caste has an effect on mental health.  Several people who faced problems in their castes, changed their religion. They face similar problems when they change their religion. So many people usually the ones belonging to the rural areas are Muslim by religion but are still addressed as Chamars. So although my religion does not believe in the caste system, some people still believe that Chamars should receive different treatment. People who have changed religion also think about the effects it would have on them and their children. This affects the mental health of such people.  So this is an issue at a much larger level although we do not witness it to a great extent in Mumbai. But we can see it in rural areas like my village in UP. My village is not very developed but you can see the effects of caste on mental health there.

Preeti: People normally talk about the lower castes in the context of mental health. However, it is important to address the way in which caste affects the mental health of the people belonging to the upper caste. I get scared when people in my native place ask me which caste I belong to. When I tell them that I am a Rajput, people tend to generalize me by saying that Rajputs are aggressive and egoistic.  During the release of the film Padmavat, my friends who believe in castes were generalizing me due to my caste. I stopped keeping in touch with them. So casteism is a big issue in India. We may say that India is a diverse country but in reality, it is a different story.

Sanket: Unity in diversity is seen at the higher levels but not in the lower ones. If this continues then we will have a very weak base so the upper part may appear strong but may not be actually so. We need to think about some very important questions like who are we? People belonging to different castes or humans? We are humans first. We are all equal. All of us know the story pertaining to caste that irrespective of the caste, our blood has the same colour i.e. red.  However, several people don’t understand it. As Shahbaan rightly said, I too have read newspapers and studied in 12th grade that casteism still exists in rural India.  We need to get in touch with such people to help them overcome difficulties caused due to this system. They still live in villages with no proper electricity and housing facilities. We must help them and educate them that this is a wrong system. Let’s look at why caste system was actually developed. It was developed for the smooth functioning of the society. The caste called ‘Brahmins’ was established to include people who would perform rituals and look after the premises of the temple because others don’t have time to do such work. The Kshatriya caste was established for the security of the people. The merchant caste (Vaishyas) was established for economic development. And the Shudra caste was made to ensure cleanliness of the surroundings. Gradually, people started believing that since someone belongs to the Shudra caste so that person must clean to earn a living. Cleaning is not a bad job. This system became more prevalent after the British rule and people’s tendency to generalize others increased. This must reduce and people especially those in the rural areas should be educated to reduce discrimination based on caste.

Raviraj: Although we have some more questions but we are falling short of time. We will provide each of you a copy of the remaining questions and we shall compile your responses in an email. Some well wishers from the audience have also written some thoughts for you.

How has this experience been for you? What is something that you will be taking with you from this discussion?

Megha: Initially, I was anxious especially when the others entered. Since everyone was more educated than me, I was clueless about what was I going to speak. As I answered each question, the anxiety within me reduced. I could truly express myself and I used this as an opportunity to enhance my mental health.

Preeti: I guess I will be taking stories from several perspectives with me. I entered this discussion with a unitary perspective about mental health and my capabilities. After having participated in today’s panel discussion, I am taking with me the experiences of others which would help me think and may change my perspective.

Anjali: I am thinking. You ask (points at Sanket)

Sanket: Thank you very much for inviting me to this panel discussion. I have realized that often, we fall short of time during such discussions. I made new friends here and a few people even asked me for my number to contact me in the future. I learnt about other’s experiences and this would definitely help me understand others better. Since I wish to pursue a career in counselling psychology, I make a point to talk to people to understand them better. So it was a very enriching and fulfilling experience for me.

Raviraj: Shahbaan and Preeti, would you like to end it with a poem?

Shahbaan: I feel happy after listening to other’s stories. I entered with an ‘Alaska wali Smile’ and will be returning with it as well. I am able to experience the ‘magic’ in this room and would to take it with me.

Anjali: I feel extremely lucky to be present her. I feel motivated after the discussion.

Sanket: I will be taking everyone’s smiles with me. I noticed that everyone had a different smile on their face and I  would always love to see them smile. I love to see people’s smiles during such events.

Raviraj: Thank you so much. 

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Impact of long-term training programs in different contexts!

At Apni Shala, “openness to learning” is one of their core values. They contribute over 30% of their time learning, unlearning and relearning to develop high-quality Social Emotional Learning (SEL) opportunities for their students. During this school year, two of their staff members, Bimba Chavan and Shahid Shaikh, are being trained with Narrative Therapy India at Ummeed Child Development Center to bring Narrative Ideas in their curriculum, pedagogy, and approach. They facilitate monthly workshops with programmes team to bring these learnings into their practice. So grateful to Ummeed team for their support in this endeavor!

 

Narrative Gathering – 10th November 2018

Greetings!

 

Inviting everyone to join us for our next Narrative Gathering  “The Wonder of Wonderfulness”.

Aileen de Souza will share her journey of wonder, through the use of the Wonderfulness Interview in her conversations with young people experiencing disabilities and their families and the world of possibilities it opens.

On completing the MHTP at Ummeed, Aileen has been using narrative ideas to empower children experiencing emotional and behavioural difficulties.

Date: 10th November Saturday  

Time: 1:30 pm to 5:30 pm

Venue: Ummeed Training Facility

Zoom is available for those who cannot come in person. 

 Fees: Nil

 Please confirm your presence by emailing @ training@ummeed.org

Consulting the Consultants : In Conversations with…

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10th October is celebrated as Mental Health Day across the world. This year Ummeed hosted a Panel Discussion where Children and Young People were invited to have conversations and share their stories, ideas about mental health and share thoughts about changes needed in the way society understands mental health and support for mental health.

It was a lively and an exciting morning filled with a lot of energy, smiles and vibrant discussion.

On being asked what is the one quality they would like to give professionals, this is what the panelists had to say…

“Samajh rakh paana, to understand where the other person is coming from” – Preeti

“Alag alag perspectives se dekh paana” – Sanket

“Unki language mein samjhana, Unki soch ke hisaab se samjhana” – Megha

“Intentional listening – Sunna aur logon ka context samajhna” – Shahbaan

“Acceptance aur power ko break karna. Koi superior/inferior nahi hona chahiye” – Anjali

World Mental Health Day – 10th October 2018

We at Ummeed invite all to join us on 10th October 2018 as we celebrate World Mental Health Day with an exciting Panel Discussion comprising of children and young people. Please refer to the flyer for more details. Spread the word.

Celebrating Mental Health Awareness Month

The Mental Health Team is looking forward to hosting some spaces through the month of October, and inviting all to celebrate the WHO Mental Health Awareness Month. We are excited to share this space with everyone through activities, workshops, and conversations. Please refer to the flyer for more information. Spread the word.

Monthly Narrative Gathering – October 2018

Greetings!

Inviting everyone to join us for our next Narrative Gathering  “Ankahi”. 

Rakesh Ghone will be sharing his journey with narrativeideas practices through the Community Mental Health Training program. 

Let us hear his wonderful story in his words.

Date: October 6th Saturday  

Time: 1:30 pm to 4:30 pm

Venue: Ummeed Training Facility

Zoom is available for those who cannot come in person. 

Poem documenting her lived experiences by Salma Safree

Salma Safree a participant from Setco Foundation reciting a poem documenting her lived experience during Community Mental Health Training Program – 4 using Narrative Ideas and Practices.

The Craziest, Wildest, Magical Thing Ever – Asking |Raviraj Shetty| TEDxTheOrchidSchool

Narrative Therapy India is super excited to share TEDx speaker…Raviraj Shetty.
What would our world feel like, if each one of us would ask before assuming? Not any kind of asking, but asking with curiosity and intention of love, care and hope. In his talk, Raviraj will share stories of what becomes possible by the simple act of asking and unpack the power of ASKING.
Raviraj lives in Mumbai with his parents, sister and an amazing bunch of friends. He is an occupational therapist, trainer, supervisor and a manager at Ummeed Child Development Center, a non- profit organization which collaborates with children experiencing disabilities and their families. He believes in his heart that people are not the problem, but the problem is the problem. Curiosity, Hope and Magic are things that guide his life.
At Ummeed, he initiated The Magical Pen-pal project, The Pen-Pal project, The special something along with The I’mperfect Fathers group.
This talk was given at a TEDx event using the TED conference format but independently organized by a local community.

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